स्वामी विवेकानंद की जीवनी । Biography Of Swami Vivekananda In Hindi 2022

स्वामी विवेकानंद की जीवनी । Biography Of Swami Vivekananda In Hindi 2022

स्वामी विवेकानंद की जीवनी । Biography Of Swami Vivekananda In Hindi 2022 technoblade

Biography Of Swami Vivekananda In Hindi:

स्वामी विवेकानंद जी वेदों के जाने माने विख्यात और अत्यधिक प्रभावशाली गुरु थे । उनका वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था । उनका जन्म 12 जनवरी, 1863 में कलकत्ता शहर में हुआ था, और उनकी मृत्यु 4 जुलाई 1902 में हुई थी ।

स्वामी विवेकानंद : स्वामी विवेकानंद जी ने अमेरिका में स्थित शिकागो शहर में एक विश्व धर्म महासभा जिस का आयोजन सन 1893 में किया गया था , उसमे उन्होंने भारत की ओर अपने सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था ।

आप को जानकर हैरानी तथा गर्व भी होगा की ,भारत का वेदांत दुनिया के सब से शक्तिशाली देश अमेरिका और यूरोप में , स्वामी विवेकानंद जी के वक्तव्य के कारण ही पहुंचा था ।

स्वामी विवेकानंद जी की गुरु निष्ठा: स्वामी विवेकानंद जी के गुरु जिनका नाम ( रामकृष्ण परमहंस) था ,उनके नाम पर ही स्वामी विवेकानंद जी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी ,जो की आज भी सुचारू रूप से चल रही है ।

विवेकानंद जी रामकृष्ण परम हंस के बहुत ही प्रिय शिष्य थे ,उन्होंने अमेरिका में भाषण देने की शुरुआत की थी ।

एक बार जब उनके गुरु की तबीयत खराब थी , और उनकी देखभाल करने की बहुत ही आवश्यकता थी , उस समय उनके  किसी शिष्य ने उनके प्रति घृणा का व्यवहार व्यक्त किया , जिसे देख कर विवेकानंद जी को बहुत ही क्रोध आया।

उन्होंने उस शिष्य को समझाया और खुद जाकर अपने गुरु जी के पास रखी थूकदानी जो की उनके गुरु जी के मुंह से गिरने वाला रक्त, तथा कफ से भरी हुई थी उसे ले जाकर फेंका करते थे ।

स्वामी विवेकानंद जी का जीवन सारांश ?

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म बंगाल राज्य के कलकत्ता शहर में हुआ था , इनके बचपन में इन्हे नरेंद्र नाथ के नाम से जाना जाता था ।

इनके पिता जी का नाम श्री विश्वनाथ दत्त था ,जो की पेशे से कलकत्ता में हाई कोर्ट के जाने माने एक वकील थे ,इनकी माता जी जिनका नाम श्री मति भुवनेश्वरी देवी जी था ,जो की पूर्ण रूप से एक धार्मिक विचारों वाली महिला थीं।

वह भगवान शंकर जी की बहुत बड़ी भक्त थीं ,उनका अधिक से अधिक समय भगवान शिव की पूजा में ही व्यतीत होता था, नरेंद्र नाथ ( स्वामी विवेकानंद जी ) धार्मिक संस्कारों वाले परिवार में जन्म लेने के कारण , भगवान में बड़ी ही आस्था रखते थे ।

वे बचपन से तेज दिमाग वाले व्यक्ति थे , और ईश्वर की आस्था में भी प्रबल थे , जिस के कारण वो ब्रम्ह समाज से भी जुड़े , पर वहां उन्हें किसी कारण वश संतोष ना मिलने के कारण उसे छोड़ दिया।

उनकी शुरू से ही यही लालसा थी की वे अपने योग,वेदांत और धर्म का प्रचार प्रसार करें ,इस में वे अपना महत्व पूर्ण योगदान देना चाहते थे ।

शुरुआती दिनों में जब वे शिक्षा ले रहे तब वे कभी कभी अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत कर लिया करते थे , वैसे भी तो बाल रूप में हर कोई शरारती हो होता है ।

स्वामी विवेकानन्द जी को करना पड़ा संकटों का सामना ?

जब स्वामी विवेकानंद जी बाल अवस्था में ही थे तभी एक दिन अचानक से उनके पिता जी की मृत्यु हो गई, जिस के कारण वे बिल्कुल असहाय हो गए , परंतु इस कठिन अवस्था में भी उन्होंने अपना धैर्य नहीं छोड़ा ।

वे अतिथि गण के बहुत ही प्रेमी थे , अतिथि का स्वागत सत्कार करने में वे कभी पीछे नहीं हटते थे , और अपनी समर्थ अनुसार वे उनका स्वागत सम्मान भी करते थे ।

कई बार उनके जीवन में ऐसी भी घटना घटी की , उनके घर पर बारिश के दिनों में मेहमान आए और उन्होंने अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते थे,और स्वयं बाहर सो जाते थे बारिश में भी भीग कर उन्होंने रात बिताई , पर अपने अतिथि को कष्ट नहीं होने दिया ।

वो बड़े ही गुरु भक्त भी थे , उन्होंने अपना सारा जीवन अपने गुरु देव श्री रामकृष्ण परम हंस जी के चरणों में न्योछावर कर दिया था । उनके गुरु देव के जब अंतिम दिन चल रहे थे और उन्होंने जब प्राण त्याग किया , उस समय विवेकानंद जी के परिवार की भी परिस्थिति अनुकूल नहीं थी ।

उस समय भी वे अपने गुरु की सेवा में सच्ची निष्ठा के साथ लगे रहे । और उनकी सेवा में दिन रात अपना समय दिया ,इस कारण से भी वे रामकृष्ण परमहंस जी के बहुत ही प्रिय शिष्य में से एक बन चुके थे ।

स्वामी विवेकानंद जी का घर शुरू से ही पूजा पाठ वा ईश्वर की भक्ति से जुड़ा हुआ था , इस लिए नरेंद्र दत्त ( विवेकानंद जी ) ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को बना चुके थे ।

शिकागो धर्म महा सम्मेलन को सभी को संबोधित करना ?

एक बार वह अमेरिका की धरती ( शिकागो) गए थे ,अपने विश्व गुरु भारत की तरफ से अपने धर्म का प्रचार एवं प्रसार करने के लिए , जहा उन्होंने अपनी एक अलग ही छाप छोड़ी थी ।
संबोधन के समय के कथन : मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों, आपने जिस हृदय वत्सल प्रेम भाव से हम लोगो का स्वागत किया है , उसके प्रति मैं आप को आभार प्रकट करने में फुले नहीं समा रहा हूं ,अत्यंत खुशी मिल रही है मुझे ।

संसार में संन्यासियों की सब से प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आप को हृदय से धन्यवाद देता हूं । धर्मों की मत की ओर से मैं आप को धन्यवाद देता हूं, और सभी संप्रदायों और हिंदुओं के गुटों की ओर से मैं आप को धन्यवाद देता हूं

मैं इस मंच से बोलने वाले उन महान वक्ताओं के प्रति भी आभार प्रकट करता हूं ,जिन्होंने ये बताया कि दूर के देशों के लोग जो अहिंसा का भाव अन्य देशों में प्रचार करने का दावा कर सकते हैं ।

मुझे ऐसे देश का नागरिक होने पर गर्व एवं अभिमान है जिसने इस धरती के समस्त धर्मों एवं देश के उत्तपिडितों को अपने यहां आश्रय दिया है ।

विवेकानंद जी की यात्रा ?

विवेकानंद जी उम्र जब 25 वर्ष की थी तभी उन्होंने केसरिया रंग का चोला ओढ़ लिया था,जो की भारत के संन्यासियों की मुख्य पहचान है ।

इसके बाद उन्होंने पूरे भारत में पैदल ही यात्रा की थी,तभी अमेरिका में विश्व धर्म परिषद का आयोजन हो रहा था ,जिस में वह भारत की ओर से धर्म प्रचारक प्रतिनिधि के रूप में भी गए थे ।

ये उस समय की बात है जब विकसित देश यूरोप और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश भारत को बहुत ही हीन दृष्टि से देखा करते थे । और वहां के लोगों ने इस बात का बहुत ही प्रयत्न किया की विश्व धर्म परिषद में स्वामी विवेकानंद जी को बोल पाने का अवसर ही ना दिया जाए ।

मगर उसी मंच पर उपस्थित एक भले प्रोफेसर ने उन्हे मंच पर बुला कर कुछ बोलने का अवसर दिया , फिर क्या था उनके द्वारा बोली गई बातो को सुनकर वहां उपस्थित सभी महानुभाव चकित रह गए । और तभी से उनका अमेरिका ने अत्यधिक स्वागत हुआ ।

लगभग 3 वर्ष तक वे अमेरिका में ही रह गए थे , तब तक वहां इनके प्रशंसकों की संख्या में भी काफी बढ़ोतरी हो गई थी । और उन्हीं के बीच रहकर वो अपने भारतीय तत्व ज्ञान की ज्योति प्रसारित करते रहे ।

स्वामी विवेकानंद जी को अमेरिका के पत्रकारों ने एक नाम ( साइक्लॉनिक) नाम से सुसज्जित किया ,ये इस कारण की उनके बोलने की शैली तथा वक्तव्य ज्ञान से वे सामने वाले को काफी प्रभावित कर देते थे ।

स्वामी विवेकानंद जी की मृत्यु ?

जीवन के अंतिम दिनों में वे कुछ बीमारियों से ग्रस्त हो गए थे उन्हें दमा तथा शर्करा जैसे बीमारी ने जकड़ रखा था , वो स्वयं ही कहते थे की मुझे ये बीमारियां 40 वर्ष की आयु भी पूरी नहीं करने देंगी।

जिस के चलते 4 जुलाई 1902 में वे बेलूर के स्वामी रामकृष्ण जी आश्रम में ध्यान लगा कर महासमाधि धारण कर लिए ,और अपने प्राण त्याग दिए ।

12 जनवरी,1863 :कलकत्ता में जन्म
सन् 1879 :प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश
सन् 1880 :जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश
नवंबर 1881 :श्रीरामकृष्ण से प्रथम भेंट
सन् 1882-86 :श्रीरामकृष्ण से संबद्ध
सन् 1884 :स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास
सन् 1885 :श्रीरामकृष्ण की अंतिम बीमारी
16 अगस्त, 1886 :श्रीरामकृष्ण का निधन
सन् 1886 :वराह नगर मठ की स्थापना
जनवरी 1887 :वराह नगर मठ में संन्यास की औपचारिक प्रतिज्ञा
सन् 1890-93 :परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण
25 दिसंबर, 1892 :कन्याकुमारी में
13 फरवरी, 1893 :प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकंदराबाद में
31 मई, 1893 :बंबई से अमेरिका रवाना
25 जुलाई, 1893 :वैंकूवर, कनाडा पहुँचे
30 जुलाई, 1893 :शिकागो आगमन
अगस्त 1893 :हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. जॉन राइट से भेंट
11 सितंबर, 1893 :विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान
27 सितंबर, 1893 :विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अंतिम व्याख्यान
16 मई, 1894 :हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण
नवंबर 1894 :न्यूयॉर्क में वेदांत समिति की स्थापना
जनवरी 1895 :न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरंभ
अगस्त 1895 : पेरिस में
अक्तूबर 1895 :लंदन में व्याख्यान
6 दिसंबर, 1895 :वापस न्यूयॉर्क
22-25 मार्च, 1896 :वापस लंदन
मई-जुलाई 1896 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान
15 अप्रैल, 1896 : वापस लंदन
मई-जुलाई 1896 :लंदन में धार्मिक कक्षाएँ
28 मई, 1896 :ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट
30 दिसंबर, 1896 :नेपल्स से भारत की ओर रवाना
15 जनवरी, 1897 : कोलंबो, श्रीलंका आगमन
6-15 फरवरी, 1897 :मद्रास में
19 फरवरी, 1897 :कलकत्ता आगमन
1 मई, 1897 :रामकृष्ण मिशन की स्थापना
मई-दिसंबर 1897 :उत्तर भारत की यात्रा
जनवरी 1898:कलकत्ता वापसी
19 मार्च, 1899 :मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना
20 जून, 1899 :पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा
31 जुलाई, 1899 :न्यूयॉर्क आगमन
22 फरवरी, 1900 :सैन फ्रांसिस्को में वेदांत समिति की स्थापना
जून 1900 :न्यूयॉर्क में अंतिम कक्षा
26 जुलाई, 1900 :यूरोप रवाना
24 अक्तूबर, 1900 :विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा
26 नवंबर, 1900 :भारत रवाना
9 दिसंबर, 1900 : बेलूर मठ आगमन
जनवरी 1901 :मायावती की यात्रा
मार्च-मई 1901 :पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा
4 जुलाई, 1902 :महासमाधि
मार्च 1902 :बेलूर मठ में वापसी
जनवरी-फरवरी 1902 :बोधगया और वारणसी की यात्रा

दोस्तो आप को हमारे युग पुरुष स्वामी विवेकानंद जी के जीवन के बारे में जान कर कैसा लगा हमे कॉमेंट बॉक्स के माध्यम से अवश्य बताएं ।

क्या स्वामी विवेकानंद की कोई जीवनी है?

इस पुस्तक में लेखक ने विवेकानंद की जीवनी का संक्षेप में वर्णन किया है। स्वामी निखिलानंद ने विवेकानंद: ए बायोग्राफी लिखी जो पहली बार 1943 में अद्वैत आश्रम से प्रकाशित हुई थी। स्वामी गंभीरानंद द्वारा लिखित युगनायक विवेकानंद (बंगाली में) पहली बार 1966-1967 में प्रकाशित हुआ था।
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स्वामी विवेकानंद की कहानी क्या है?

विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को मकर संक्रांति उत्सव के दौरान, ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता में 3 गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट पर अपने पैतृक घर में एक बंगाली परिवार में नरेंद्रनाथ दत्त (नरेंद्र या नरेन से छोटा) के रूप में हुआ था। वह एक पारंपरिक परिवार से ताल्लुक रखते थे और नौ भाई-बहनों में से एक थे।

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